उत्तर प्रदेश के गांवों में उम्मीद
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में गांव-गांव जाकर लोगों को हिवरे बाज़ार की फिल्म दिखाना और फिर स्वराज की बात रखने का प्रयोग जनवरी 2010 के पहले सप्ताह में किया गया। इसके तहत गांव में जाकर उस गांव के सक्रिय और गम्भीर लोगों के साथ चर्चा की जाती और फिर एक बड़ी बैठक का आयोजन किया जाता। इस बैठक में लोगों के साथ गांव की ज़रूरतों पर चर्चा की जाती।
हर गांव की आम समस्या- सबसे बडी समस्या है कि एक किसान को अपनी जमीन की फरद निकलवानी है तो उसे पटवारी से लेकर एसडीएम तक न जाने किस-किस से गुहार लगानी पड़ती है। गरीब आदमी को अगर आय, जाति, निवास का प्रमाण पत्र बनवाना हो तो वह भी ग्राम सचिव से लेकर उपर तक के अधिकारियों के धक्के खाने पड़ते हैं, लेकिन रिश्वत दिये बिना फिर भी उसका काम नहीं होता है।
हरेक गांव की अलग समस्या – किसी गांव में बिजली के तार टूटे पड़े हैं तो कहीं ट्रांसफॉर्मर नहीं है। कहीं लोगों ने कहा कि सबसे पहले लड़कियों का स्कूल बनना चाहिए तो किसी गांव के लोगों ने ने कहा कि शहर से जोड़ने वाली बस होनी चाहिए। किसी गांव में गांव के अन्दर की सड़कें खराब हैं तो किसी को अपने गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क ठीक करवानी है। हल्की सी बातचीत से ही समझ में आ जाता है कि गांव में लोगों को क्या चाहिए। हर गांव वाला जानता है कि उसके गांव में क्या ज़रूरत है। इसके लिए उन्हें कोई इंजीनियर या विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है।
इसके बाद चर्चा की जाती है कि पिछले चार पांच साल में गांव में सरकार ने क्या काम कराए हैं। तो पता चलता है कि गांव में जो काम कराए गए उनमें से ज्यादातर की तो गांव में आवश्यकता थी ही नहीं। लोगों से बिना पुछे योजनाएं बनीं, उनका पैसा आया और चूंकि लोगों की ज़रूरत ही नहीं थी अत: लोगों ने भी उस ओर ध्यान नहीं दिया और सारा पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।
तो इससे बैठक में मौजूद गांववालों को समझ में आया कि योजनाओं के बारे में न तो उनसे पूछा जाता है कि आपको क्या चाहिए और न ही इन योजनाओं के अमल में लाने में कोई भूमिका है जबकि सारी योजनाएं है तो गांव के लिए ही।
इस तरह फिर उन्हें हिवरे बाज़ार गांव की फिल्म दिखाकर प्रेरित किया जाता है कि अगर गांव में ग्राम सभाएं होने लगें तो यह समस्या खत्म हो जाएगी। ज़रूरत इस बात की है कि इस बार के पंचायत चुनाव में किसी ऐसे व्यक्ति को प्रधान बनाया जाए जो ग्राम सभाएं करे।
पहले चरण में इस तरह की बैठकें 7 गांवों में की गई और सभी गांवों में नौजवानों में यह उत्साह देखने को मिला कि वे अपने गांव की स्थिति सुधारने के लिए कुछ करना चाहते हैं। स्वराज अभियान में उन्हें एक रास्ता दिखाई दे रहा है।

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अपने विदेशी दोस्तों को ऐसी ही तस्वीरें दिखाकर राहुल गाँधी देश को बदनामकर रहें हें
क्या ये भी राजनीति का हिस्सा है ?