सरकारें फेल हो गईं हैं : लेकिन समाधान सत्ता परिवर्तन नहीं व्यवस्था की पहचान में है

- रणसिंह आर्य

– रणसिंह आर्य
मित्रो!
सरकारें आज फेल हो गईं हैं। व्यक्ति को अवसर, न्याय, सुरक्षा देने में ये नाकाम हैं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधन पर कब्ज़ा करने का माध्यम बनती जा रही हैं। आज आज़ादी के नाम जो दिखता उसमें गहरी गुलामी दिखती है। सता में बैठे लोगों की गुलामी। बाज़ार की गुलामी।
आज सरकार का मतलब शासन हो गया है। और शासन मनुष्य को स्वीकार्य नहीं है, व्यवस्था स्वीकार्य है। शासन में जो काम हो रहा है वह लोगों की ज़रूरतों को समझे बगैर हो रहा है। आज सरकार कुछ अच्छे लोगों की भी बन जाएगी तो भी सफल नहीं होगी। क्योंकि इसमें मेरी, मेरे गांव की, मेरे समाज की आवश्यकता कोई दूसरा पहचानता है और क्रियान्वत करता है। यह एक अव्यावहारिक बात है, अप्राकृतिक बात है।
भारत के इतिहास में कई ऐसी घटनाएं घटी हैं। जब लोगों को लगा है कि शासन, राजतन्त्र उन्हें कमज़ोर कर रहे हैं तो इतिहास में कई तरह के प्रयोग हुए हैं, आज हमें उनसे समझने की आवश्यकता दिखती है। आज जो परिवर्तन वाले लोग हैं, वो चाहे वाम धाराओं के थे, या फिर समाजवादी धाराओं के थे, और भी कई धाराओं के थे, वे आज थक गए, उनका जोश ढीला दिखता है। जो व्यवस्था परिवर्तन वाले लोग हैं वे सत्ता परिवर्तन से आगे जाते नहीं दिखते। उनकी परिणति एक दल की जगह दूसरे दल की सरकार बनाने बनवाने में ही हुई है। जो धर्म गदि्दयां हैं, वे बाज़ार गदि्दयों के नियन्त्रण में हैं। बाज़ार का मतलब कोई छोटी मोटी दुकान से नहीं है बल्कि दुनिया के प्राकृतिक साधनों पर कब्ज़ा करने की प्रवृत्ति से है। इस समय दुनिया के प्राकृतिक वैभव-जंगल, जल, ज़मीन, खनिज आदि हैं, ऊर्जा के स्रोत हैं उन सब पर कब्ज़ा हो रहा है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज बाज़ार और शिक्षा मिल गए हैं। 20-22 साल की शिक्षा, 101 टीवी चैनल और ये बाज़ार, सब मिलकर मनुष्य को उन्मादी बना रहे हैं।
आज की जो समस्याओं हैं -जनसंख्या व्रद्धि, भ्रष्टाचार, प्रदूषण, गरीबी, अशिक्षा, राजनीतिक पतन आदि, ये लक्षण हैं, समस्याएं गहरी हैं। गहरी समस्याओं के दो रूप दिखते हैं कि दो सभ्यताओं के कमज़ोर पक्ष भारत में एक साथ हावी हैं। पूरब और पश्चिम की सभ्यताओं के जो नकारात्मक पक्ष थे वे आज अपने देश में हावी हैं और दुनिया में भी भावी हैं। पश्चिमी सभ्यता में भी कुछ अच्छी चीज़ें थीं वे दबी हुई हैं और इस समय वहां भी कब्ज़ेबाज़ी का ही प्रयास है। अमेरिका और यूरोप में जो सुविधाएं लोगों को देने की कोशिश की गईं वह अपने आप में असफल सिद्ध हो चुकी है।  दुनिया को गुलाम या उपनिवेश बना कर या सामान के आधार पर फंसा कर आधुनिकता चल रही है। उधर जो भारतीय पक्ष है वह राष्ट्रीयता और सामाजिकता के भावानात्मक पक्षों पर खरी नहीं उतर पा रही है। धर्म और अध्यात्म भी इसमें शामिल है। आदमी और आदमी के रिश्ते को यहां स्वीकार नहीं किया जा रहा। जैसे हमने छुआछूत को कानून के रूप में तो दूर कर लिया लेकिन आदमी आदमी के बीच अभी दूरियां हैं। यह कलंक मुझे भारतीय पक्ष में दिखता है। मुझे लगता है कि सामाजिक समता समरसता के मामले में हम कहीं ऊंचे रहे होंगे लेकिन इस समय तो हम कहीं असफल हो चुके। गहरे में कहें तो अपनी संस्कृति में समाज एक बड़े वर्ग को हिस्सेदारी नहीं मिली। किसान, कारीगर, मजदूर मुझे संस्कृति से बहिष्कृत लोग नज़र आते हैं। कुछ अच्छी बातें भी रहीं लेकिन सामाजिक ढंग से विश्लेषण करते हैं तो पूरब और पश्चिम, दोनों ही सभ्यताओं के नकारात्मक पक्ष यानि उनकी कमज़ोरियां, इस समय देश दुनिया में हावी हैं। दोनों ही के अच्छे पक्ष भी थे लेकिन उन्हें नज़रअन्दाज़ कर दिया।
और शायद आज जिस तरह दुनिया में दूरियां घट रही हैं उस रूप में पश्चिम वाले अपनी सभ्यता के प्रति अहंकार का भाव रखें, हम अपने को श्रेष्ठ बताएं, वे अपने को श्रेष्ठ बताएं… इस संघर्ष की जगह एक ऐसी सभ्यता की ज़रूरत दिखती है जो मानवीय हो, हर धर्म-मजहब को स्वीकार्य हो। इस पर यदि हम काम नहीं कर पाएंगे तो छोटे छोटे राहत कार्यक्रम तक रह जाएंगे।
कुछ मित्र तकनीकी से जुड़े बैठे हैं उनका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि आधुनिकता व्यवस्था में श्रम का अपमान हुआ, सम्मान नहीं हुआ। जितनी भी तकनीकि हमारे यहां विकसित हुई उसमें हाथों या पशुओं से चलने वाले यंत्रों पर कोई मौलिक काम, अच्छे दिमाग से या किसी अच्छे संस्थान द्वारा, नहीं हुआ। इन लोगों ने जो काम क्या वो सारा उस दिशा में किया जो पेट्रोल पर आधारित है, गैस, बिजली, कोयले आदि पर आधारित है. प्राकृतिक व्यवस्था पर ध्यान नहीं गया और समाज का जो बड़ा तबका जो उस तकनीकी से अपनी आजीविका चलाता था आज वह मजदूर बनकर शहर में जाने को मजबूर है। ये समीक्षा लंबी है इसमें ज्यादा नहीं जाऊंगा। लेकिन समाधान क्या है। इसके लिए एक छोटी सी बात और जो बड़े पैमाने पर मानी जा रही है।
जिस समय दुनिया की आर्थिक दशा करवट ले रही थी, सन 1700 में और उसके बाद तक भी, विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का स्थान 24.6 प्रतिशत माना जा रहा है. चीन उस समय भारत से 2 प्रतिशत कम है. और आज दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में हमारी 0.86 प्रतिशत भागीदारी है। कितना बड़ा परिवर्तन है। यह कैसे हो गया इस पर कोई विचार नहीं हो रहा है। इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
कितना बड़ा परिवर्तन है। यह कैसे हो गया इस पर कोई विचार नहीं हो रहा है। इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है। मुझे लगता है कि जिस देश में मजदूर नहीं होता था उस देश में बंधुआ मजदूर कहां से आ गया? 1773 में बंधुआ मजदूर की जडे़ जमनी शुरू हुई थी और 1792 में कुछ कुछ इसकी झलक देखने को मिली। जमीन्दारी प्रथा जो अंग्रेजों ने चलाई तो पहले जो किसान थे वो धीरे-धीरे मजदूर बन गए और धीरे-धीरे फिर वो बंधुआ मजदूर बन गए।
और मित्रों मैं तो यह भी कहना चाहता हूं कि जब हम यह कहते हैं कि इस सरकार को पश्चिम की सरकार चला रही है, अब पश्चिम को कौन चला रहा है? तो गहरा सवाल तो यह है। कौन दुनिया को चला रहा है? किसके हाथ में ताकत है? कहां से क्रान्ति आ रही है? कौन प्रेरणा दे रहा है? जिस व्यवस्था के संकट हैं समाधान भी वहीं से आएंगे। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि इस संविधान के तहत समाधान तलाशे जाएं. संविधान में जब सही व्यक्ति की पहचान नहीं तो संविधान को कैसे ढोएंगे? देश के सम्मान के लिए हम उसका विरोध् नहीं करेंगे। एक राष्ट्रीयता की भावना के साथ हम उस संविधान को स्वीकार करते हैं। जो व्यक्ति सही व्यक्ति की पहचान नहीं करा सकता उसको हम कैसे खड़ा कर लेंगे? हालांकि इस संविधान को बदलने की बात करने वालों से भी मैं सहमत नहीं हूं। कुछ गहरा करना है तो समझकर, बैठकर करना होगा। ये हवाई बातों से देश ठीक नहीं होगा। मैं बहुत लोगों को सुन चुका हूं, कोई 2011 में कोई 12 में कोई कभी और क्रान्ति ला देने का दावे करते हैं। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर अभी हमारा ध्यान सत्ता परिवर्तन की ओर ही ज्यादा है। किसी का 2014 के चुनाव पर ध्यान है तो लग रहा है किसी का उससे अगले चुनाव पर ध्यान है।
कई लोग कहते हैं कि तुम राजनीति की बात नहीं करते। भईया हम तो सच्चे राजनीतिज्ञ हैं। लेकिन अभी आप जिसे राजनीति कह रहे हैं वह दुष्टनीति है। हमने खुद को कह दिया तो हम भी दुष्टनीति में गिन लिए जाएंगे। हम कितनी ही सफाई देंगे, लेकिन पांच सात दिन हमारी बात सुनोगे तब समझ में आएगा कि यह राजनीति कैसी है। और राजनीति कहना भी अधुरा है. कुल मिलाकर प्रकृति में तीन नीतियां दिखती हैं- एक का नाम है अर्थनीति, एक का नाम है धर्म नीति और एक का नाम है राज्यनीति। बुज़ुगो ने जो शब्द दिए उनके सहारे से इस बात को रख रहा हूं। प्रकृति से कितना लेना है इसका नाम है अर्थनीति। प्रकृति से लिया है उसको कैसे सदुपयोग करें इसका नाम है धर्मनीति, और जो मिला है और जो है उसकी कैसे सुरक्षा करें, कैसे सवर्धन करें उसका नाम है राज्यनीति। और ये तीनों साथ हैं अलग-अलग नहीं हैं। हर व्यक्ति इस व्यवस्था में हिस्सा ले। यह भाषणबाज़ी से नहीं आएगा। इसके लिए ज़मीन तैयार करनी पड़ेगी। और हमारे बारे में कुछ लोग भ्रम पाल लें कि हम व्यवस्था पर काम कर रहे हैं तो अभी तक तो ज़मीन ही तैयार नहीं। स्वराज या मानवीय व्यवस्था पर तो लोग अभी सोचना शुरू करें। अभी तो हज़ारेक जुड़े हैं इससे काम नहीं चलेगा। पर जगह-जगह लोगों को यह बात छू रही है इससे हौसला बढ़ा है कि रास्ता निकल रहा है। व्यवस्था में हर व्यक्ति की भागीदारी है। बच्चे से लेकर सांस छोड़ते बच्चे की भागीदारी है। वो व्यवस्था प्रकृति में है और जो-जो इसे समझेगा वह खुश होगा…।
इस (सरकारी) व्यवस्था में बैठे लोग जो मूर्खता कर रहे हैं उसे देखना पड़ेगा। पिछले 25 सालों में शिक्षा का खुभ प्रसार-प्रचार हुआ है। लेकिन ज़रा जांच कर देखें कि पिछले 25 सालों में आदमी और आदमी का आपसी रिश्ता कमज़ोर हुआ है या मजबूत हुआ है? इसी तरह प्रकृति और आदमी का रिश्ता पिछले 25 सालों में कमज़ोर हुआ है या मजबूत हुआ है? इसी को विकास कहा जा रहा है। आज इस विकास की जितनी योजनाएं बन रही है उसमें प्रकृति के वैभव को शोषित किया जा रहा है। तो मुझे ऐसा लगता है कि विकास क्या हो यह चिन्ता कोई और बैठकर करेगा क्या? मेरा गांव कैसा हो, हम कैसे खड़े हों, कैसी शिक्षा दें, यह हम ही तय करें. हम इतने कमज़ोर नहीं थे। अयोग्य नहीं है। एक बार थोड़ा धूल झाड़ने की ज़रूरत है, थोड़े मनोबल की ज़रूरत है, खड़े होंगे तो यहां बउत संभावनाएं दिख रही हैं। मैंने रिक्शा चला रहे युवाओं को, मजदूरों के बच्चों को जिस तरह सोचते और उस दिशा में काम करते देखा है उससे भरोसा दिखता है। कई गरीब लड़कें ने अपनी कमेटी बनाकर ही बैंक जैसा बना लिया और कई लाख इकट्ठा कर लिए। मुझे तो ये सब संभावना के संकेत दिखते हैं।
तो मूल रूप से एक ही रिश्ता है। समझ पर काम हो. स्वयं की, संबंधों की, व्यवस्था की. व्यवस्था का मतलब है मानवीय संविधान का उदय होना। व्यवस्था बनानी नहीं है, वह है। उसको समझेंगे तो भागीदार हो जाएंगे।
तो मित्रों! हम सरकार के प्रति कोई विरोध् नहीं कह रहे. जहां भी हैं, जो भी हो! वहीं बैठकर कैसे मैं अपने को, अपने परिवार को, अपने समाज को, अपने गांव को कैसे सजाऊं. और गांव में मैं अकेला नहीं हूं। गांव के लिए मिल बैठना पड़ेगा, बातचीत चलानी पड़ेगी. हिम्मत के साथ बातचीत चलाएंगे तो रास्ते निकलेंगे। तो मूल बात यहां दिखती है कि आवश्यकता का अध्ययन किया जाए। और भारत में बहुत बड़ी संभावना दिखती है… मनुष्य पर विश्वास करेंगे तो सब ठीक होगा। अभी तो मनुष्य पर विश्वास नहीं किया जा रहा।

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2 Responses

  1. व्यवस्था को पहचानने के पहले शासन ही होता है।

  2. vichar bahut aachea hi lege raho

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