कैसे सुलझेंगे जमीन और उद्योग के मुद्दे


जमीन का मामला धीरे-धीरे एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। पिछले दिनों जमीन के चलते ही देश के कई हिस्सों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि उद्योग के लिए जमीन जरुरी है। लेकिन पिछले दिनों जिस तरह से भूमि अधिग्रहण हुआ है उससे कई गंभीर सवाल उठते हैं।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के नजदीक टाटा के एक प्लांट के लिए दस गांवों की जमीन के अधिग्रहण की जरुरत थी। यह एक पेसा (PESE) क्षेत्र था इसलिए राज्य सरकार के लिए स्थानीय लोगों से सलाह करना कानूनी तौर पर जरुरी था। इलाके की ग्राम सभाओं ने अपनी जमीन देने से मना कर दिया। जब सरकार ने पुनर्विचार करने को कहा तो ग्राम सभाओं ने जमीन के बदले 13 मांगे सामने रखीं। ये सभी मांगे जायज थीं। इन मांगों को स्वीकार करने के बदले सरकार ने जबरन जमीन अधिग्रहण कर लिया।

क्या गांव वालों के पास ये अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो खुद उद्योगपतियों से जमीन के बदले मिलने वाली सुविधाओं, पैसे और शर्तों के बारे में बातचीत करे। अगर ऐसा होता है तो उद्योगपति भी गांव वालों के प्रति जिम्मेदार हो जाएंगे और ग्राम सभा के निर्णय का सम्मान करेंगे। उपरोक्त व्यवस्था लागू हो जाए तो गावों के बीच अपने यहां उद्योग लगाने के लिए होड़ मच जाएगी। उद्योगपति चाहें तो लोगों को रोजगार दे सकते हैं। ऐसे काम कर सकते हैं जिससे पर्यावरण को लाभ पहुंचे और ग्रामीण समुदाय का भला हो सके। यदि उद्योगपति किसी भी शर्त का उल्लंघन करते हैं तो ग्राम सभा के पास उसका लाइसेंस निरस्त करने का अधिकार होना चाहिए। इस तरह उद्योगपति हमेशा गांववालों के प्रति जिम्मेवार बने रहेंगे।

वर्तमान में जमीन अधिग्रहण से ले कर शर्त इत्यादि तय करने का काम राज्य सरकारें कर रही हैं। अत: उद्योगपति भी खुद को गांववालों के बजाए नौकरशाह और नेताओं के प्रति जवाबदेह समझने लगते हैं।

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